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Wednesday, February 27, 2019

The Ant and Grasshopper

The Ant did the hard work as it did as always and the grasshopper sang as he did as usual. The ant put its day and night to do the task which was given by the boss to her. The grasshopper always found a way to escape from the situation. The boss was not happy with the grasshopper. He always appreciated the ant. The ant always eager to complete the task but the grasshopper worked to prove his salary, The ant was sure that this time she would get the promotion. It was a promotion time. The boss increased the heat when he considered the grasshopper for the promotion. It disappointed the ant. She heard the old story in which the ant won in the end. The grasshopper preached the ant, "Only hard work is not the key to success. It is a boss perception which makes you successful." The ant refused to leave the habit of hard-working. The grasshopper refused to leave his habit of droning. The boss pleased the ant but sometimes pleased the grasshopper also. The grasshopper took the lead over the ant gradually. Then promotion happened it was not the grasshopper. All of you are thinking that finally, the ant won? You are wrong! The ant was also not the winner. The beetle won the race. He got the promotion. He was the employee of the company in which, the boss had worked before. He was close to the boss till the time. MORAL OF THE STORY: It doesn't matter whether you are an ant or a grasshopper. Whether you are a hard worker or a drone only those candidate get the promotion who are closer to the boss.

Monday, February 25, 2019

बॉस की सांत्वना

चीटी और टिड्डा दोनो ही नाराज़ थे। प्रोमोशन के नाम पर मिला धोखा बर्दाश्त नही कर पा रहे थे। उनका गुस्सा अपने इमीडियेट बॉस  कॉकरोच पर फट पड़ा।
कॉकरोच ने पूरी कोशिश की चीटी और टिड्डे को समझाने की पर दोनों ने ही बगावती तेवर अपना लिये थे। कॉकरोच ने अपने बॉस छिपकली को यह संदेश दिया। छिपकली ने सख्त रुख अपनाया और कहा कि यह मैनेजमेंट का फैसला है। मगर चीटी और टिड्डा ने यह फैसला मानने से इनकार कर दिया।
छिपकली को भी समझ आ गया कि मामला बिगड़ गया है। उसने अपने बॉस गिरगिट को यह जानकारी दी। गिरगिट ने मामले की गंभीरता को समझा और छिपकली को मीटिंग बुलाने के लिए कहा गया। छिपकली ने यह संदेश कॉकरोच को दिया।
मीटिंग मे गिरगिट ने पहला सवाल पूछा, "किसे दिक्कत है?"
टिड्डा कुछ बोलने के लिए खड़ा हुआ पर उसके बोलने से पहले ही सुपर बॉस गिरगिट बोला, ' अगर दिक्कत है तो इस्तीफा दो और जहा प्रोमोशन मिले वहाँ नौकरी कर लो।"
टिड्डे की बोलती बंद हो गयी। चीटी ने भी सोचा की रु. 30000 महीने की तो ईएमआई ही जाती है अगर नौकरी गयी तो खाने के लाले पड़ जाएंगे।
और इस तरह, हर तरह के विरोध ने उस मीटिंग मे दम तोड़ दिया।
MORAL OF THE STORY: बॉस का हर कदम सही ही होता है और अगर नही भी होता हो तो मान लेना चाहिए कि सही है। क्योंकि अगर एक महीने तनख्वाह नही आई तो ईएमआई कैसे जाएगी।

Monday, February 18, 2019

चीटी और टिड्डा

चींटी हमेशा की तरह मेहनत करती थी। और टिड्डा हमेशा मस्ती करता था। उन दिनों टिड्डे को तिलचट्टे का साथ भी मिल गया था।
चींटी हमेशा बॉस के दिये टास्क को जी जान से पूरा करने में जुट जाती जबकि टिड्डा हमेशा दिये हुए टास्क को दाये बाये कर देता।चीटी टिड्डे को समझाती तो टिड्डा चीटी की मजाक बना देता। ऐसे समय में तिलचट्टा भी टिड्डे की हां में हॉ मिलाता।
बॉस टिड्डे से नाखुश था और चीटी की तारीफ करता। चीटी को हमेशा लगता कि अब की बार तो पक्का प्रमोशन मिलेगा।
अब की बार मीटिंग जब हुई तो बॉस ने टिड्डे को भी प्रमोशन का दावेदार बता दिया। चीटी बहुत दुखी थी उसने तो पुरानी कहानी सुनी थी जिसमे चीटी और टिड्डे में से मेहनती चीटी जीत गयी थी।
टिड्डे ने फिर चीटी को समझाया कि काम करने से ज्यादा जरूरी काम करते दिखना है। इतनी मेहनत से कुछ हासिल नही होगा।
पर चीटी अपनी मेहनत से पीछे नही हटी  औऱ टिड्डा अपनी हरकतों से बाज़ नही आया और  बॉस कभी चीटी को फेवर करता तो कभी टिड्डे को।
मामला कुल मिला कर टिड्डे के फेवर में बनता जा रहा था। चीटी दुखी थी इतनी मेहनत के बाद भी उसकी काबिलियत पर प्रश्नचिन्ह था जबकि टिड्डा कम काम करके भी  उससे आगे था।
फिर प्रमोशन हुआ मगर टिड्डे का नही हुआ। तो फिर किसका हुआ?
आपको लग रहा होगा कि चीटी का हुआ? जी नही प्रमोशन गुबरेले का हुआ जो बॉस की पहली कंपनी में उसके साथ काम करता था।
Moral of the story:  आप चाहे चीटी हो या टिड्डा। आप चाहै दिन रात काम करे या निखट्टू बन के मलाई खाये। प्रमोशन हमेशा उसका होता है जो बॉस का प्रिय हो।

Monday, December 3, 2018

बॉस का चुटकुला

शेर की मीटिंग चल रही थी. उसका सबऑर्डिनेट तेंदुआ, तेंदुए का सबऑर्डिनेट चीता, और फ्रंट लाइन मैनेजर्स जैसे लोमडी सियार भेड़िया।हाइना मीटिंग में उपस्थित थे.
शेर का पूरा ध्यान अपने स्टाफ को कॉरपोरेट एटिकेट्स सिखाने पर था. बीच बीच में शेर भाषण को बोर होने से बचाने के लिए एकाध चुटकुला उसमे जोड़ देता था.
सब हंसते थे पर लोमड़ी उस चुटकुले का मतलब नोट कर लेती थी. लोमडी का ध्यान पूरी तरह शेर के भाषण पर था.
शेर ने यह बात नोट की लोमडी चुप बैठी है और हंस नही रही. उसे लगा कि लोमडी सीरियसली मीटिंग अटेंड नही कर रही है.
शेर चुटकुला सुनाता हुआ लोमडी के पास आया और अचानक पूछा कि क्या आप मीटिंग में है?
तेंदुए और चीते ने गुर्रा कर लोमड़ी को देखा. लोमडी घबरा गयी. उसने जो कुछ भी नॉट किया था वो शेर को दिखा दिया.
शेर कुछ सोच कर बोला अगर आप मीटिंग में है तो हंस क्यो नही रही है?
उसके बाद लोमडी शेर के हर चुट्कुले पर ठहाका मार मार कर हंसी. उसे लगा कि शायद शेर को अब शिकायत नही होगी.
मीटिंग खत्म होने के बाद नाराज़ तेंदुए ने लोमडी और उसके बॉस चीते को तलब किया. तेंदुआ बहुत गुस्से में था. उसने चीते को वार्निंग दी कि लोमडी को तमीज़ सिखाये इस तरह मीटिंग में हंसा जाता है क्या?

Moral of the story:
बॉस के चुटकुले पर हंसो या मत हंसो बैंड हमेशा जूनियर की बजती है

Sunday, December 2, 2018

बॉस का डिसकशन

टारगेट हो रहे थे और इन्वेंट्री अंडर कंट्रोल थी फिर भी शेर चिंतित था. उसे लग रहा था कि उसने अपने एम्प्लॉयीज को उसकी क्षमता से कम टारगेट दिया था.
उसे  चिंता थी कि अगले साल क्या टारगेट हो जो उसके एम्प्लॉइज की क्षमता के अनुकूल हो. उसने तुरंत एक  डिस्कशन मीटिंग बुलाई. उसने अपने सबऑर्डिनेट तेंदुए और उसके सबऑर्डिनेट चीते को आदेश दिया गया कि पूरे साल का सेल्स डेटा और इन्वेस्टमेंट की डिटेल एक्सेल शीट पर तैयार करे और अपने सुझाव तैयार करे कि कैसे सेल बढ़ेगी और उसके हिसाब से टारगेट दिए जायेंगे.
तेंदुए ने चीते के साथ मिल कर 20 पॉइंट्स तैयार किये. तय समय पर तेंदुआ और चीता डिस्कशन के लिए पहुच गए. मीटिंग शुरू हुई. लंच तक शेर कंपनी के विज़न के बारे मैं बताता रहा. लंच के बाद शेर ने कंपनी के टारगेट के बारे में बताना शुरू किया. तेंदुआ और चीता अलर्ट हो कर डिस्कशन कर लिए तैयार थे यद्यपि लंच में।किये भोजन से उन्हें हल्की से नींद आ रही थी. टी टाइम तक शेर उन्हें टारगेट और रेवेन्यू जनरेशन के बारे में बताता रहा.
टी टाइम के बाद शेर ने उन्है हिंट देना शुरू किया कि पॉसिबल टारगेट इस साल के टारगेट का दुगना हो सकता है. तेंदुआ और चीता ने इसका विरोध किया और डिस्कशन के लिए तैयार किया गया डेटा दिखाने की कोशिश की. इस पर शेर भड़क गया और तेंदुए, चीते की घिग्घी बंध गयी.
आखिरकार शेर ने उन पर तरस खाते हुए टारगेट इस साल के टारगेट का डेढ़ गुना कर दिया और डिस्कशन मीटिंग खत्म हो गयी. 
तेंदुए और चीते ने राहत की सांस ली कि आखिरकार वह टारगेट कम कराने में कामयाब रहे पर उन्हें चिंता थी कि वह डाउन द लाइन इसे कैसे बताए. बहुत सोच विचार कर उन्होंने एक डिस्कशन मीटिंग बुलाई. हर डाउन द लाइन एम्प्लाइज को मेल लिखी गयी कि अमुक तारीख को ठीक 10 बजे सेल्स डेटा और इन्वेस्टमेंट डिटेल के साथ निश्चित स्थान पर पहुचे क्योकि कुछ डिस्कशन होना है.
Moral of the story:
बॉस के साथ डिस्कशन का मतलब बॉस की तैयार स्पीच को सुनना, उसकी भाषा का मतलब समझना और उसके दिए टारगेट को बिना बहस एक्सेप्ट करना होता है

Friday, November 30, 2018

असन्तुष्ट बॉस

शेर ने देखा लोमड़ी अपना काम सबसे जल्दी खत्म कर घर पहुच जाती है. तो शेर को यकीन हो गया कि लोमड़ी अपना काम मन लगा कर नही कर रही है. उसने लोमडी की review meeting बुलाई. लोमड़ी को आदेश दिया गया कि सारा डेटा एक पॉवरपॉइंट प्रेजेंटेशन के द्वारा शेर के सामने प्रस्तुत किया जाए.
शेर ने हर फ़ाइल को खंगाला लेकिन लोमडी के काम में कोई कमी नही दिखाई दी. तो शेर को मानना पड़ा कि लोमडी ठीक काम कर रही है. पर उसे संतुष्टि नही हुई.
उसे लग रहा था कि लोमडी को उसकी योग्यता से कम काम दिया गया है और वेतन उसे ज्यादा मिल रहा है.
आखिरकार एक बार फिर review meeting बुलाई गई इस बार उसमे भेड़िया सियार और हाइना भी बुलाये गये. यानी पूरा स्टाफ बुलाया गया तो पाया गया कि सियार के हिस्से में जो काम है वह उसमे100%  output नही आ रहा है पर सियार सुबह से लेकर शाम तक मेहनत करता था अतः उसको और अच्छा काम करने के लिए मोटिवेट किया गया.
भेड़िया के रिव्यु  हुआ तो भेड़िया ने हाँ हॉ ना ना में अपना रिव्यु टाइम निकाल दिया. शेर को गुस्सा आया तो उसने भेडियो को ज्यादा आउटपुट निकलने का टारगेट दिया.
हाइना जो था वह मजबूत बैकग्राउंड से था मुंहफट भी था और दबंग भी था. शेर उससे थोड़ा घबराता भी था.
तो शेर ने कुछ एवें सवाल पूछे जिसे हाइना ने हंस कर दाये बाये कर दिया. और उसका रिव्यु खत्म हो गया.
अब फिर लोमडी की बारी आई. शेर को अब भी लग रहा था कि लोमडी का वेतन ज्यादा है तो काम भी ज्यादा होना चाहिए. तो उसने एक टेरिट्री लोमडी को और दे दी आउटपुट निकालने को.
अब शेर संतुष्ट था कि लोमडी बिजी है. पर कुछ दिन बाद उसने देखा कि लोमडी ने अपने समय में उस टेरेटरी को भी एडजस्ट कर लिया है और पहले की तरह अब भी वह घर जल्दी पहुंच जाती है. शेर फिर असन्तुष्ट हो गया रिव्यु का कोई फायदा नही था तो उसने पहले एक सलाह के तौर पर और फिर आदेश के रूप में लोमडी के लिए यह अनिवार्य कर दिया कि वह दस नए क्लाइंट से रोज़ मिले.
शेर अब बेचैन था कि लोमडी उसके आदेश का पालन नही कर रही है. एक पर्सनल मीटिंग में इस बात को लेकर शेर ने लोमडी से इस बारे में जानकारी चाही तो लोमडी ने उसे आश्वस्त करते हुए कहा कि काम हो रहा है. पर शेर को यकीन नही हुआ.
एक बार फिर रिव्यु हुआ और लोमडी को थोड़ा काम और दिया गया. अब लोमडी पर काम का बोझ बाद गया था. वह कई बार काम भूल जाती.  कई बार लेट हो जाती.
अब शेर को लगने लगा कि लोमड़ी काम को कैसुअली ले रही है. उसे लोमडी के ड्रेस सेंस पर खीझ आने लगी. अक्सर उसकी बहस लोमडी से हो जाती.
आखिरकार शेर ने एक दिन लोमडी को जंगल छोड़ने का आदेश दे दिया.
सियार अब भी दिन भर मेहनत करता था पर आउटपुट 100% नही आता था, भेड़िया अब भी चिक चिक झिक झिक कर  काम चला रहा था और हाइना से कुछ कहने की हिम्मत तो पहले भी किसी में नही थी.
पर शेर संतुष्ट था. उसे एक नई लोमडी की तलाश थी जो पुरानी लोमडी की जगह ले सके

Moral of the story
कॉरपोरेट वर्ल्ड में जितना काम आ करते हो उससे ज्यादा करते हुए दिखना चाहिए वरना किसी दिन आपको भी बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है.

Sunday, January 10, 2016

नर्सरी एडमिशन: फिर वही पुरानी कहानी

दिल्ली मैं आजकल नर्सरी एडमिशन की मारामारी चल रही है।बेचारे पेरेंट्स एक स्कूल से दूसरे स्कूल के चक्कर लगा रहे है।
हर स्कूल का एडमिशन का क्राइटेरिया अलग,पॉइंट सिस्टम अलग, डॉक्यूमेंट अलग।
किसी स्कूल मैं 40 पॉइंट्स डिस्टेंस के है तो किसी मे डिस्टेंस के केवल दस पॉइंट्स ही है। द्वारका की तरफ के स्कूल मैं डिस्टेंस की जगह द्वारका और एक्स द्वारका के पॉइंट्स है। सिबलिंग और अलुमनाइ के पॉइंट्स लगभग हर जगह निर्णायक है। इससे पेरेंट्स के लिए दुविधा बहुत बढ़ गयी है। हर पेरेंट्स 20 से 30 स्कूल्ज मैं रजिस्टर कर रहे है।
डाक्यूमेंट्स के मामले मैं भी यही पेंच है। किसी मैं पेरेंट्स की आईडी एड्रेस प्रूफ और बर्थ सर्टिफिकेट से ही काम चल रहा है तो कही पर मेडिकल फिटनेस, एफिडेविट भी चाहिए। कही पर डॉक्टर का फिटनेस सर्टिफिकेट चाहिए तो कही स्कूल के फॉर्मेट पर फिटनेस चाहिए। कही पर केवल बच्चे की फोटो ही पर्याप्त है तो कही पर पेरेंट्स की फोटो भी साथ चाहिए।
रजिस्ट्रेशन फॉर्म्स के लिए नियम है की स्कूल केवल 25 रुपये वसूल सकते है और प्रॉस्पेक्टस नहीं बेच सकते है। ज्यादातर स्कूल इसका पालन कर रहे है मगर कुछ स्कूल खुलेआम प्रोस्पेक्टस बेच रहे है। और 125 से 250 तक वसूल रहे है।
इसके अलावा रजिस्ट्रेशन फॉर्म्स के लिए टाइम भी अलग अलग है।
कोई 7 बजे से 11 बजे तक फॉर्म दे रहा है। कोई 9 से 1.00बजे तक। कही 12.30 तक ही फॉर्म्स मिल रहे है। हर जगह अलग अलग समय। पहले कहा गया था की रजिस्ट्रेशन ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरह से होंगे मगर ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन केवल कुछ ही स्कूल्ज मैं है।
सरकार के तमाम दावों के बावजूद ज्यादार स्कूल्स ने अपने फीस के बारे मैं न तो जानकारी वेबसाइट पर डाली है ऩा ही स्कूल के बाहर प्रदर्शित की है। पूछने पर भी स्पष्ट जवाव के बदले गोलमोल उत्तर मिलते है। वैसे ज्यादार स्कूल्ज ने फीस 4000प्रतिमाह से ऊपर ही है। जो ट्रांसपोर्ट और अन्य खर्चो के साथ 5500 से 6000 प्रतिमाह तक जा रही है। जो दो बच्चो वाले मिडिल क्लास पेरेंट्स की दम निकालने के लिए पर्याप्त से भी ज्यादा है।
इन सबके ऊपर एडमिशन के समय दी जाने वाली एकमुश्त राशी जो तमाम तरह के चार्ज के नाम पर ली जा रही है 13000 से 40000 हज़ार तक है। इसके अलावा वेतन आयोग की सिफारिशे भी अभिभावकों के दिल की धड़कन बडा रही है। यह भी अभिभावकों से ही फीस मैं १० से १५% वृद्धि के रूप मैं वसूलने की तैयारी की जा रही है.
यानी कुल मिला कर अफरा तफरी सी है। अगर आप किसी स्कूल के बाहर जाए तो परेशानहाल अभिभावक आपको अपने दुःख बाटते मिल जायेंगे।सबसे ज्यादा समस्या उन दो बच्चो वाले अभिभावकों की है जिनके दूसरे बच्चे का किसी दूसरे स्कूल मैं नबर आने की उम्मीद है। क्योकि बड़ी क्लास मैं एडमिशन के तो कोई नियम ही नही है।
पिचले पांच से छह महीने से दिल्ली सरकार तमाम दावे कर रही थी की व्यवस्था सुधरेगी। मगर अब नतीजा वही ढाक के तीन पात ही है। तमाम बड़ी बड़ी बातो और बड़े बड़े दावों के बाद हालत वही है। सरकारी स्कूल्ज के हालत जहा बद से बदतर हुए है वही प्राइवेट स्कूल्ज की मनमानिया और बड़ी ही है। शिक्षा का बजट डेढ़ गुना करने का कोई फायदा फिलहाल तो होता दिख ही नहीं रहा।
शिक्षा का अधिकार किसी सरकार के अजेंडे मैं नहीं है और दिल्ली की सरकार इसका अपवाद नहीं।

The power of timely action

The difference between success and failure is marginal. Sometimes, a person who is talented, efficient, confident, and equipped with knowled...