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Monday, December 3, 2018

बॉस का चुटकुला

शेर की मीटिंग चल रही थी. उसका सबऑर्डिनेट तेंदुआ, तेंदुए का सबऑर्डिनेट चीता, और फ्रंट लाइन मैनेजर्स जैसे लोमडी सियार भेड़िया।हाइना मीटिंग में उपस्थित थे.
शेर का पूरा ध्यान अपने स्टाफ को कॉरपोरेट एटिकेट्स सिखाने पर था. बीच बीच में शेर भाषण को बोर होने से बचाने के लिए एकाध चुटकुला उसमे जोड़ देता था.
सब हंसते थे पर लोमड़ी उस चुटकुले का मतलब नोट कर लेती थी. लोमडी का ध्यान पूरी तरह शेर के भाषण पर था.
शेर ने यह बात नोट की लोमडी चुप बैठी है और हंस नही रही. उसे लगा कि लोमडी सीरियसली मीटिंग अटेंड नही कर रही है.
शेर चुटकुला सुनाता हुआ लोमडी के पास आया और अचानक पूछा कि क्या आप मीटिंग में है?
तेंदुए और चीते ने गुर्रा कर लोमड़ी को देखा. लोमडी घबरा गयी. उसने जो कुछ भी नॉट किया था वो शेर को दिखा दिया.
शेर कुछ सोच कर बोला अगर आप मीटिंग में है तो हंस क्यो नही रही है?
उसके बाद लोमडी शेर के हर चुट्कुले पर ठहाका मार मार कर हंसी. उसे लगा कि शायद शेर को अब शिकायत नही होगी.
मीटिंग खत्म होने के बाद नाराज़ तेंदुए ने लोमडी और उसके बॉस चीते को तलब किया. तेंदुआ बहुत गुस्से में था. उसने चीते को वार्निंग दी कि लोमडी को तमीज़ सिखाये इस तरह मीटिंग में हंसा जाता है क्या?

Moral of the story:
बॉस के चुटकुले पर हंसो या मत हंसो बैंड हमेशा जूनियर की बजती है

Sunday, December 2, 2018

बॉस का डिसकशन

टारगेट हो रहे थे और इन्वेंट्री अंडर कंट्रोल थी फिर भी शेर चिंतित था. उसे लग रहा था कि उसने अपने एम्प्लॉयीज को उसकी क्षमता से कम टारगेट दिया था.
उसे  चिंता थी कि अगले साल क्या टारगेट हो जो उसके एम्प्लॉइज की क्षमता के अनुकूल हो. उसने तुरंत एक  डिस्कशन मीटिंग बुलाई. उसने अपने सबऑर्डिनेट तेंदुए और उसके सबऑर्डिनेट चीते को आदेश दिया गया कि पूरे साल का सेल्स डेटा और इन्वेस्टमेंट की डिटेल एक्सेल शीट पर तैयार करे और अपने सुझाव तैयार करे कि कैसे सेल बढ़ेगी और उसके हिसाब से टारगेट दिए जायेंगे.
तेंदुए ने चीते के साथ मिल कर 20 पॉइंट्स तैयार किये. तय समय पर तेंदुआ और चीता डिस्कशन के लिए पहुच गए. मीटिंग शुरू हुई. लंच तक शेर कंपनी के विज़न के बारे मैं बताता रहा. लंच के बाद शेर ने कंपनी के टारगेट के बारे में बताना शुरू किया. तेंदुआ और चीता अलर्ट हो कर डिस्कशन कर लिए तैयार थे यद्यपि लंच में।किये भोजन से उन्हें हल्की से नींद आ रही थी. टी टाइम तक शेर उन्हें टारगेट और रेवेन्यू जनरेशन के बारे में बताता रहा.
टी टाइम के बाद शेर ने उन्है हिंट देना शुरू किया कि पॉसिबल टारगेट इस साल के टारगेट का दुगना हो सकता है. तेंदुआ और चीता ने इसका विरोध किया और डिस्कशन के लिए तैयार किया गया डेटा दिखाने की कोशिश की. इस पर शेर भड़क गया और तेंदुए, चीते की घिग्घी बंध गयी.
आखिरकार शेर ने उन पर तरस खाते हुए टारगेट इस साल के टारगेट का डेढ़ गुना कर दिया और डिस्कशन मीटिंग खत्म हो गयी. 
तेंदुए और चीते ने राहत की सांस ली कि आखिरकार वह टारगेट कम कराने में कामयाब रहे पर उन्हें चिंता थी कि वह डाउन द लाइन इसे कैसे बताए. बहुत सोच विचार कर उन्होंने एक डिस्कशन मीटिंग बुलाई. हर डाउन द लाइन एम्प्लाइज को मेल लिखी गयी कि अमुक तारीख को ठीक 10 बजे सेल्स डेटा और इन्वेस्टमेंट डिटेल के साथ निश्चित स्थान पर पहुचे क्योकि कुछ डिस्कशन होना है.
Moral of the story:
बॉस के साथ डिस्कशन का मतलब बॉस की तैयार स्पीच को सुनना, उसकी भाषा का मतलब समझना और उसके दिए टारगेट को बिना बहस एक्सेप्ट करना होता है

Friday, November 30, 2018

असन्तुष्ट बॉस

शेर ने देखा लोमड़ी अपना काम सबसे जल्दी खत्म कर घर पहुच जाती है. तो शेर को यकीन हो गया कि लोमड़ी अपना काम मन लगा कर नही कर रही है. उसने लोमडी की review meeting बुलाई. लोमड़ी को आदेश दिया गया कि सारा डेटा एक पॉवरपॉइंट प्रेजेंटेशन के द्वारा शेर के सामने प्रस्तुत किया जाए.
शेर ने हर फ़ाइल को खंगाला लेकिन लोमडी के काम में कोई कमी नही दिखाई दी. तो शेर को मानना पड़ा कि लोमडी ठीक काम कर रही है. पर उसे संतुष्टि नही हुई.
उसे लग रहा था कि लोमडी को उसकी योग्यता से कम काम दिया गया है और वेतन उसे ज्यादा मिल रहा है.
आखिरकार एक बार फिर review meeting बुलाई गई इस बार उसमे भेड़िया सियार और हाइना भी बुलाये गये. यानी पूरा स्टाफ बुलाया गया तो पाया गया कि सियार के हिस्से में जो काम है वह उसमे100%  output नही आ रहा है पर सियार सुबह से लेकर शाम तक मेहनत करता था अतः उसको और अच्छा काम करने के लिए मोटिवेट किया गया.
भेड़िया के रिव्यु  हुआ तो भेड़िया ने हाँ हॉ ना ना में अपना रिव्यु टाइम निकाल दिया. शेर को गुस्सा आया तो उसने भेडियो को ज्यादा आउटपुट निकलने का टारगेट दिया.
हाइना जो था वह मजबूत बैकग्राउंड से था मुंहफट भी था और दबंग भी था. शेर उससे थोड़ा घबराता भी था.
तो शेर ने कुछ एवें सवाल पूछे जिसे हाइना ने हंस कर दाये बाये कर दिया. और उसका रिव्यु खत्म हो गया.
अब फिर लोमडी की बारी आई. शेर को अब भी लग रहा था कि लोमडी का वेतन ज्यादा है तो काम भी ज्यादा होना चाहिए. तो उसने एक टेरिट्री लोमडी को और दे दी आउटपुट निकालने को.
अब शेर संतुष्ट था कि लोमडी बिजी है. पर कुछ दिन बाद उसने देखा कि लोमडी ने अपने समय में उस टेरेटरी को भी एडजस्ट कर लिया है और पहले की तरह अब भी वह घर जल्दी पहुंच जाती है. शेर फिर असन्तुष्ट हो गया रिव्यु का कोई फायदा नही था तो उसने पहले एक सलाह के तौर पर और फिर आदेश के रूप में लोमडी के लिए यह अनिवार्य कर दिया कि वह दस नए क्लाइंट से रोज़ मिले.
शेर अब बेचैन था कि लोमडी उसके आदेश का पालन नही कर रही है. एक पर्सनल मीटिंग में इस बात को लेकर शेर ने लोमडी से इस बारे में जानकारी चाही तो लोमडी ने उसे आश्वस्त करते हुए कहा कि काम हो रहा है. पर शेर को यकीन नही हुआ.
एक बार फिर रिव्यु हुआ और लोमडी को थोड़ा काम और दिया गया. अब लोमडी पर काम का बोझ बाद गया था. वह कई बार काम भूल जाती.  कई बार लेट हो जाती.
अब शेर को लगने लगा कि लोमड़ी काम को कैसुअली ले रही है. उसे लोमडी के ड्रेस सेंस पर खीझ आने लगी. अक्सर उसकी बहस लोमडी से हो जाती.
आखिरकार शेर ने एक दिन लोमडी को जंगल छोड़ने का आदेश दे दिया.
सियार अब भी दिन भर मेहनत करता था पर आउटपुट 100% नही आता था, भेड़िया अब भी चिक चिक झिक झिक कर  काम चला रहा था और हाइना से कुछ कहने की हिम्मत तो पहले भी किसी में नही थी.
पर शेर संतुष्ट था. उसे एक नई लोमडी की तलाश थी जो पुरानी लोमडी की जगह ले सके

Moral of the story
कॉरपोरेट वर्ल्ड में जितना काम आ करते हो उससे ज्यादा करते हुए दिखना चाहिए वरना किसी दिन आपको भी बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है.

Sunday, January 10, 2016

नर्सरी एडमिशन: फिर वही पुरानी कहानी

दिल्ली मैं आजकल नर्सरी एडमिशन की मारामारी चल रही है।बेचारे पेरेंट्स एक स्कूल से दूसरे स्कूल के चक्कर लगा रहे है।
हर स्कूल का एडमिशन का क्राइटेरिया अलग,पॉइंट सिस्टम अलग, डॉक्यूमेंट अलग।
किसी स्कूल मैं 40 पॉइंट्स डिस्टेंस के है तो किसी मे डिस्टेंस के केवल दस पॉइंट्स ही है। द्वारका की तरफ के स्कूल मैं डिस्टेंस की जगह द्वारका और एक्स द्वारका के पॉइंट्स है। सिबलिंग और अलुमनाइ के पॉइंट्स लगभग हर जगह निर्णायक है। इससे पेरेंट्स के लिए दुविधा बहुत बढ़ गयी है। हर पेरेंट्स 20 से 30 स्कूल्ज मैं रजिस्टर कर रहे है।
डाक्यूमेंट्स के मामले मैं भी यही पेंच है। किसी मैं पेरेंट्स की आईडी एड्रेस प्रूफ और बर्थ सर्टिफिकेट से ही काम चल रहा है तो कही पर मेडिकल फिटनेस, एफिडेविट भी चाहिए। कही पर डॉक्टर का फिटनेस सर्टिफिकेट चाहिए तो कही स्कूल के फॉर्मेट पर फिटनेस चाहिए। कही पर केवल बच्चे की फोटो ही पर्याप्त है तो कही पर पेरेंट्स की फोटो भी साथ चाहिए।
रजिस्ट्रेशन फॉर्म्स के लिए नियम है की स्कूल केवल 25 रुपये वसूल सकते है और प्रॉस्पेक्टस नहीं बेच सकते है। ज्यादातर स्कूल इसका पालन कर रहे है मगर कुछ स्कूल खुलेआम प्रोस्पेक्टस बेच रहे है। और 125 से 250 तक वसूल रहे है।
इसके अलावा रजिस्ट्रेशन फॉर्म्स के लिए टाइम भी अलग अलग है।
कोई 7 बजे से 11 बजे तक फॉर्म दे रहा है। कोई 9 से 1.00बजे तक। कही 12.30 तक ही फॉर्म्स मिल रहे है। हर जगह अलग अलग समय। पहले कहा गया था की रजिस्ट्रेशन ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरह से होंगे मगर ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन केवल कुछ ही स्कूल्ज मैं है।
सरकार के तमाम दावों के बावजूद ज्यादार स्कूल्स ने अपने फीस के बारे मैं न तो जानकारी वेबसाइट पर डाली है ऩा ही स्कूल के बाहर प्रदर्शित की है। पूछने पर भी स्पष्ट जवाव के बदले गोलमोल उत्तर मिलते है। वैसे ज्यादार स्कूल्ज ने फीस 4000प्रतिमाह से ऊपर ही है। जो ट्रांसपोर्ट और अन्य खर्चो के साथ 5500 से 6000 प्रतिमाह तक जा रही है। जो दो बच्चो वाले मिडिल क्लास पेरेंट्स की दम निकालने के लिए पर्याप्त से भी ज्यादा है।
इन सबके ऊपर एडमिशन के समय दी जाने वाली एकमुश्त राशी जो तमाम तरह के चार्ज के नाम पर ली जा रही है 13000 से 40000 हज़ार तक है। इसके अलावा वेतन आयोग की सिफारिशे भी अभिभावकों के दिल की धड़कन बडा रही है। यह भी अभिभावकों से ही फीस मैं १० से १५% वृद्धि के रूप मैं वसूलने की तैयारी की जा रही है.
यानी कुल मिला कर अफरा तफरी सी है। अगर आप किसी स्कूल के बाहर जाए तो परेशानहाल अभिभावक आपको अपने दुःख बाटते मिल जायेंगे।सबसे ज्यादा समस्या उन दो बच्चो वाले अभिभावकों की है जिनके दूसरे बच्चे का किसी दूसरे स्कूल मैं नबर आने की उम्मीद है। क्योकि बड़ी क्लास मैं एडमिशन के तो कोई नियम ही नही है।
पिचले पांच से छह महीने से दिल्ली सरकार तमाम दावे कर रही थी की व्यवस्था सुधरेगी। मगर अब नतीजा वही ढाक के तीन पात ही है। तमाम बड़ी बड़ी बातो और बड़े बड़े दावों के बाद हालत वही है। सरकारी स्कूल्ज के हालत जहा बद से बदतर हुए है वही प्राइवेट स्कूल्ज की मनमानिया और बड़ी ही है। शिक्षा का बजट डेढ़ गुना करने का कोई फायदा फिलहाल तो होता दिख ही नहीं रहा।
शिक्षा का अधिकार किसी सरकार के अजेंडे मैं नहीं है और दिल्ली की सरकार इसका अपवाद नहीं।

Thursday, January 7, 2016

हिन्दू है हम

कभी घर वापसी के कार्यक्रम, तो कभी चर्च पर हमले, कभी कहा जाता है ज्यादा बच्चे पैदा करो, तो कभी बीफ पर बैन लगाने की बात कुछ मसले हिन्दू होने से जुड़े है और कुछ जोड़े जा रहे है।
    ऐसे मैं यह जानना जरूरी है की हिन्दू होने के मायने क्या है। कही ऐसा तो नहीं सिर्फ सुनी हुई बाते और बनायी हुई अवधारणायो और पूर्वाग्रहों के आधार पर भारत भूमि पर सदियो से पलती बढती संस्कृति को नकारा जा रहा हो।
हो रही है राजनीति

हिन्दू और हिंदुत्व के नाम पर देश पर मैं खासी राजनीति होती रही है। कुछ उंगली पर गिने जाने लायक नेताओ और  साध्वियो के बड़बोलेपन को कट्टर हिंदुत्व का नाम देकर हिंदुत्व को कटघरे मैं खड़ा किया जाता रहा है।
  वही उन्ही के जैसे बड़बोलापन दिखाने वाले अन्य धर्मो के नेताओ, पादरियों और मौलवियो की बात या तो नज़रअंदाज़ कर दी जाती है या उसे संज्ञान मैं ही नहीं लिया जाता। चार बच्चे पैदा करने की साक्षी महाराज की अपील या साध्वी प्राची के बयान के ऊपर हंगामा खड़ा कर दिया जाता है। वही दक्षिण भारत के कई पादरी जो ईसाई समाज से दस बच्चे पैदा करने की अपील करते है या हैदराबाद के दो मुस्लिम नेता 25 मिनट मिनट मैं पूरे हिन्दू समाज को निबटाने की बात करते है तो वह कभी बहस का मुद्दा नहीं बनती।
  अगर कोई संघ का नेता हिन्दू राष्ट्र की बात करता है तो वह मिनटो मैं सुर्ख़ियो बन जाती है। मगर जब कोई मौलवी साहब या अल्पसंख्य्क नेता टीवी पर बड़े इत्मीनान से कहते है की हम सेक्युलर नहीं हो सकते तो यह कभी बहस का मुद्दा नहीं होता।
उद्देश्य बड़बोले नेताओ के और साध्वियो की बदजुबानी को सही ठहराना नहीं है सिर्फ यह बताना है की ऐसे नेता या संत सिर्फ हिन्दू समाज मैं ही नहीं हर धर्मो मैं है। और इन कथित हिन्दू नेताओ या साध्वियो से बड़ा जनाधार रखते है।
और घर वापसी
इस तरह के बयानों के बीच हाल ही मैं चर्चा मैं रहा घर वापसी का मसला। यह इतना ज्यादा चर्चा मैं रहा कि लगा की शायद हिन्दुस्तान मैं पहली बार धर्मान्तरण हुआ है और इससे बड़ा अन्याय हिन्दू अल्पसंख्यको के साथ कर ही नहीं सकते।
  जबकि हकीकत इससे थोड़ी अलग है। देश के पूर्वोत्तर इलाको,उड़ीसा, केरल, और आदिवासी बहुल इलाको मैं धर्मान्तरण 50 सालो से ज्यादा समय से होता रहा है।इसके अलावा चंगाई सभाओ और चमत्कारी इलाज के नाम पर यह देश के सभी हिस्सों मैं चल रहा है और यह  निरंतर जारी है। कई बार इसकी वजह से तनाव हुए है । मगर इसमे से सिर्फ उस हिस्से को खबर बनाया जाता रहा जिसमे इन सब के विरोध के फलस्वरूप हुई मारपीट और तोड़फोड़ शामिल होती है।
जब VHP के नेता शिकायत करते है की हर roz 70 से ज्यादा हिन्दूओ का धर्मान्तरण किया जा रहा है या एक साल से मैं 100 से ज्यादा चर्च हिन्दू बहुल इलाको मैं धर्मान्तरण के उद्देश्य से बनाये जा रहे है तो कोई उनकी बात को तवज्जो ही नहीं देना चाहता मगर जब वही VHP के लोग इसी अंदाज़ मैं घर वापसी कराते है तो तूफ़ान खड़ा हो जाता है।
जबकि हकीकत मैं घर वापसी इतना बड़ा कार्यक्रम ही नहीं है की वह हिन्दुओ के धर्मान्तरण का मुकाबला कर सके
उद्देश्य धर्मान्तरण को जायज या नाजायज ठहराना नहीं है सिर्फ आइना दिखाना है की किस तरह हिंदुत्व के साथ पूर्वाग्रही बर्ताव किया जाता है।
बीफ बैन बना बड़ा मसला
अभी कुछ राज्यो मैं बीफ बैन किया गया है। इस पर काफी बहस छिड़ी हुई है। इसके विरोध की मुख्य वजह है की इससे मुस्लिम कसाइयो को नुक्सान होगा अगर यहाँ भी आप देखे तो यहाँ हिन्दू समाज की भवानाओ से खिलवाड़ करने मैं कोई संकोच नहीं मगर इससे अन्य धर्मावलंबियो को नुक्सान नहीं होना चाहिए।
  गाय हिन्दुओ को धार्मिक पशु है। और अगर सिर्फ मांस के लिए देखा जाये तो गाय काटने ज्यादा फायदेमंद हमेशा भैंस काटना होता होता है। अगर शुरू से ही मुस्लिम कसाई एक नियम बना लेते की गाय नही काटेंगे तो इससे समाज मैं सांप्रदायिक् सद्भाव की एक मिसाल पैदा होती और बीफ बैन करने की नौबत ही नहीं आती। और ऐसा भी नहीं है की गाय काटना मुस्लिम्स का कोई धार्मिक कर्तव्य है। बकरीद पर कई बार देवबंद से और कई माने हुए मौलाना ने यह फतवे भी दिए है की हिन्दुओ से सद्भाव दिखाते हुए मुस्लिम्स गाय की कुर्बानी न करे। मगर व्यवहार मैं इससे अलग ही देखने को मिलता है। गाय काटना हमेशा से ही साम्प्रदायिक तनाव का एक कारण रहा है।
  अगर एक्टर ऋषि कपूर या गिरीश कर्नाड के बीफ बैन से जुड़े ट्वीट या क्रियाकलापो को इतनी मीडिया अटेंशन मिलती है तो करोडो हिन्दुओ को जो गाय काटने के खिलाफ है मीडिया अटेंशन क्यों नही मिलती?

अगर सभी दुष्प्रचारों और पूर्वाग्रही रिपोर्टिंग को सही माना जाय तो ऐसा लगता है की हिन्दू और हिंदुत्व इस देश की सबसे कट्टर कम्युनिटि है और सारे साम्प्रदायिक तनाव सिर्फ इसी से जुड़े है।
   जबकि हकीकत इसके बिलकुल उलट है।इस देश मैं हिन्दू की संख्या लगभग 80 करोड़ है। अगर किसी देश की आबादी का इतना बड़ा हिस्सा धार्मिक रूप से इतना कट्टर होता जितनी की इसकी छवि बनायी गयी है तो शायद इस देश मैं कोई और धर्म ना तो पनपता और ना ही कोई धर्म बचता जबकी जमीनी हकीकत कुछ और है। हमारे बगल मैं ही दो मुल्क है बंगलादेश और पाकिस्तान जहा हिन्दू अल्पसंख्यक है। और पिछले चार दशको मैं वहा उनकी संखया निरंतर घटी है। बांग्लादेश एक सेक्युलर जबकि पकिस्तान सेक्युलर मुल्क के रूप मैं पैदा हुआ और अब मुस्लिम देश है। और दोनों ही जगह अल्पसंख्यक हिन्दुओ को अमानवीय अत्याचारो और यातनाओ से रोज सामना करना होता है। 

  इसके अलावा पूरे एशिया मैं अल्पसंख्यको को जो धार्मिक और सामजिक स्वतंत्रता यहाँ हासिल है उतनी कही भी नहीं है। ब्रिटेन जैसे देश मैं भी बॉबी जिंदल को चुनाव जीतने के लिए ईसाइयत को अपनाना पड़ता है। वहा भी उनकी कुशलता से ज्यादा उनका धर्म मायने रखता है। अगर भारत मैं ऐसा है तो इसकी वजह संविधान नहीं बहुसंक्यक हिन्दुओ का धर्मनिरपेक्ष होना है।

Tuesday, January 5, 2016

EVEN / ODD: A SOLUTION??

   1st January 2016 was unique in history of Delhi. Delhi government has started an experiment to correct the increasing level of Air Pollution. It is known as even odd system. According to this even numbered cars can run on even dates and odd numbered cars can run on odd numbered dates.
   Idea behind this is to reduce the number of cars on the roads of Delhi. It is assumed it can reduce half numbers of total running cars on Delhi Roads. Heavy fine of Rs 2000/-  will be charge if anyone violate the rule.
This system seems effective in reducing the number of cars on Delhi roads. Delhi roads which are known for heavy traffic looks empty. It is something which was never assumed before. Most of the Delhi peoples are following it. So Kejariwal government can pat his back for this
Now the real question arises. Does all this exercise is done to just reduce the number of cars on Delhi roads?? Real objective is still out of reach. Pollution level is still on dangerous level and it doesn't seem that odd/even is helpful in this exercise. In fact cars have less percentage in producing pollution. Different factors like chimney fumes, other vehicles emission , burning of garbage and agricultural waste. Cars have only 10% role in pollution. 

 So odd/even becomes successful It is really a big question?
(Pictures are taken from Google) 

Tuesday, December 22, 2015

सेक्युलर ????

मेरा यह दृढ विश्वास है की इस देश मैं एक धड़ा है जिसे इस देश की वास्तविक समस्याओ से कोई लेना नहीं ये वो धड़ा है जो अपनी धूर्ततापूर्ण सिद्धांतो को सच साबित करने के लिए सच का गला दबाने के लिए आतुर है।
और यह धडा है इस देश के तथाकथित स्वयंभू सेकुलरिज्म के ठेकेदार। जो व्यवहार मैं ही नहीं विचारों से भी अत्यधिक साम्प्रदायिक है मगर सेकुलरिज्म का दुपट्टा ओढ कर अपने को बुद्धजीवी दिखाने का भोंडा प्रदर्शन करते हुए नज़र आते है। इस कवायद् मैं वह अपनी संकीर्ण मानसिकता और विचारधारा का प्रदर्शन करते हुए कब साम्प्रदायिकता की सीमा का अतिक्रमण करते है खुद उन्हें भी यह अहसास शायद ही कभी होता है।
मुझे आश्चर्य होता है ऐसी दोगली विचारधारा के साथ दोहरा व्यक्तित्व जीने वाले लोग रोज़ सुबह आइना कैसे देखते होंगे ? आइना देखते हुए उनके मन मैं क्या विचार आते होंगे। क्या उनको अपने बीते हुए दिन मैं बोले गए झूठो पर ग्लानि होती होगी या अपने धूर्ततापूर्ण कारनामे पर गर्व होता होगा।
ऐसे गिलगिले और लिजलिजे व्यक्तित्व के साथ मुस्कराना वाकई हिम्मत की बात है। और इस काम के लिए ये छद्मनिर्पेक्ष वाकई बधाई के पात्र है।
ये धूर्ततम इंसानों की वो ब्रीड है जो बहस के उन मुद्दों को तुरंत खारिज करने मैं अपनी सफलता समझती है जो उन की विचारधारा के खिलाफ जाती हो या जो असहज करने वाले कटु सत्य से जुडी हो।
और इसकी वजह है अर्धसत्य प्रस्तुत करना हमेशा सुविधाजनक होता है विशेषकर तब की जब उसे एक खोखली और लिज्लीजी विचारधारा का समर्थन करना हो।
मगर तर्को को कभी भी शोर से दबाया नहीं जा सकता और सच सामने आ कर ही रहता है चाहे कितना भी कड़वा हो।

The power of timely action

The difference between success and failure is marginal. Sometimes, a person who is talented, efficient, confident, and equipped with knowled...