मेरा यह दृढ विश्वास है की इस देश मैं एक धड़ा है जिसे इस देश की वास्तविक समस्याओ से कोई लेना नहीं ये वो धड़ा है जो अपनी धूर्ततापूर्ण सिद्धांतो को सच साबित करने के लिए सच का गला दबाने के लिए आतुर है।
और यह धडा है इस देश के तथाकथित स्वयंभू सेकुलरिज्म के ठेकेदार। जो व्यवहार मैं ही नहीं विचारों से भी अत्यधिक साम्प्रदायिक है मगर सेकुलरिज्म का दुपट्टा ओढ कर अपने को बुद्धजीवी दिखाने का भोंडा प्रदर्शन करते हुए नज़र आते है। इस कवायद् मैं वह अपनी संकीर्ण मानसिकता और विचारधारा का प्रदर्शन करते हुए कब साम्प्रदायिकता की सीमा का अतिक्रमण करते है खुद उन्हें भी यह अहसास शायद ही कभी होता है।
मुझे आश्चर्य होता है ऐसी दोगली विचारधारा के साथ दोहरा व्यक्तित्व जीने वाले लोग रोज़ सुबह आइना कैसे देखते होंगे ? आइना देखते हुए उनके मन मैं क्या विचार आते होंगे। क्या उनको अपने बीते हुए दिन मैं बोले गए झूठो पर ग्लानि होती होगी या अपने धूर्ततापूर्ण कारनामे पर गर्व होता होगा।
ऐसे गिलगिले और लिजलिजे व्यक्तित्व के साथ मुस्कराना वाकई हिम्मत की बात है। और इस काम के लिए ये छद्मनिर्पेक्ष वाकई बधाई के पात्र है।
ये धूर्ततम इंसानों की वो ब्रीड है जो बहस के उन मुद्दों को तुरंत खारिज करने मैं अपनी सफलता समझती है जो उन की विचारधारा के खिलाफ जाती हो या जो असहज करने वाले कटु सत्य से जुडी हो।
और इसकी वजह है अर्धसत्य प्रस्तुत करना हमेशा सुविधाजनक होता है विशेषकर तब की जब उसे एक खोखली और लिज्लीजी विचारधारा का समर्थन करना हो।
मगर तर्को को कभी भी शोर से दबाया नहीं जा सकता और सच सामने आ कर ही रहता है चाहे कितना भी कड़वा हो।
और यह धडा है इस देश के तथाकथित स्वयंभू सेकुलरिज्म के ठेकेदार। जो व्यवहार मैं ही नहीं विचारों से भी अत्यधिक साम्प्रदायिक है मगर सेकुलरिज्म का दुपट्टा ओढ कर अपने को बुद्धजीवी दिखाने का भोंडा प्रदर्शन करते हुए नज़र आते है। इस कवायद् मैं वह अपनी संकीर्ण मानसिकता और विचारधारा का प्रदर्शन करते हुए कब साम्प्रदायिकता की सीमा का अतिक्रमण करते है खुद उन्हें भी यह अहसास शायद ही कभी होता है।
मुझे आश्चर्य होता है ऐसी दोगली विचारधारा के साथ दोहरा व्यक्तित्व जीने वाले लोग रोज़ सुबह आइना कैसे देखते होंगे ? आइना देखते हुए उनके मन मैं क्या विचार आते होंगे। क्या उनको अपने बीते हुए दिन मैं बोले गए झूठो पर ग्लानि होती होगी या अपने धूर्ततापूर्ण कारनामे पर गर्व होता होगा।
ऐसे गिलगिले और लिजलिजे व्यक्तित्व के साथ मुस्कराना वाकई हिम्मत की बात है। और इस काम के लिए ये छद्मनिर्पेक्ष वाकई बधाई के पात्र है।
ये धूर्ततम इंसानों की वो ब्रीड है जो बहस के उन मुद्दों को तुरंत खारिज करने मैं अपनी सफलता समझती है जो उन की विचारधारा के खिलाफ जाती हो या जो असहज करने वाले कटु सत्य से जुडी हो।
और इसकी वजह है अर्धसत्य प्रस्तुत करना हमेशा सुविधाजनक होता है विशेषकर तब की जब उसे एक खोखली और लिज्लीजी विचारधारा का समर्थन करना हो।
मगर तर्को को कभी भी शोर से दबाया नहीं जा सकता और सच सामने आ कर ही रहता है चाहे कितना भी कड़वा हो।
no plus ones